अंजलि के घर के बाहर आंसू रो रहे थे, सिसकियों के जमघट के बीच सुनाई दे रहा था खामोश चीखों का शोर

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Kanjhawala Case: वो अंजलि थी, जो पत्थर दिल हो चुकी दिल्ली की सड़कों पर घिसट घिसटकर मारी गई। दिल्ली पुलिस के लिए वो एक महज केस था। जो हादसे और हत्या की गुत्थी से ज़्यादा कुछ नहीं। लेकिन जरा मंगोलपुरी के उस घर का हाल तो देखिये...जिस घर के लिए अंजलि एक बेटी नहीं ...कमाऊ पूत बन चुकी थी।

दिल्ली की हांड कंपाने वाली सर्दी की उस शाम, जब मीडिया के तमाम कैमरे अंजलि के घरों पर डेरा डाले हुए थे...उस घर का आलम इतना अजीब था, कि देखकर आंखें भीग जाती है। ऐसा लग रहा था मानों किसी ऐसे घर पर आ गए हैं जहां से अभी अभी कोई लड़की डोली में विदा हुई है....और सारा घर बिखरा हुआ, बेटी के बिछड़ने का गम सारे आलम पर तारी नज़र आता है....कुछ लोग जोर जोर आवाज में इस कदर बतियाते दिखाई पड़ गए कि घर के भीतर सिसकियों का दम उसमें घुटकर रह गया।

प्लास्टिक के गिलासों में चाय और पानी दिया जा रहा, कुछ कुर्सियों में एक दूसरे से चिपके जा रहे लोग आपस में बैठकर गम साझा कर रहे हैं। घर के बड़े बुजुर्ग चुपके चुपके अपनी शॉल और दुपट्टे से आंखों में छलक आए आंसुओं को पोंछकर अपने अपने हिस्से का ग़म हल्का कर लेते हैं। घर के ठीक सामने आलाव जलाए बैठी कुछ महिलाएं अपनी बातों और यादों से ही जूझती दिखाई दीं...

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Kanjhawala Case Update: घर से थोड़ी ही दूर मोहल्ले के कुछ लोग आपस में झुंड बनाकर सर्दी और बेवजह की बातों से बचने की जद्दोजहद में जूझते दिखाई दे जाएंगे। वो भी अंजलि की ही बातें कर रहे हैं। चंद कदमों की दूरी पर गली के कोने में कुछ और लोग दिखाई पड़ सकते हैं।

तभी उस घर की तरफ नज़र उठती है, जिसे लोग अंजलि का बता रहे हैं। सिर को नीले रंग की शॉल से ढके जो महिला सबकी नज़रों से ओझल हो जाना चाहती है...वो सबके बीच नज़र आने लगती है। जबसे अंजलि की खबर ने मीडिया को घेरा बस तभी से ये नीली शॉल से ढका सिर यहां तमाम लोगों के बीच सवालों भरी नज़रों और आस बंधाते बोलों के बीच घिरा नज़र आ रहा है।

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वो औरत और कोई नहीं अंजिल की मां है, जिसके मुंह से बस एक ही बात यहां कई लोग बार बार सुन रहे हैं, वो हमारे घर की आदमी थी...जो कमाती थी, खिलाती थी...आखिरी बार जब वो घर से निकली थी...तब उसने अपनी मां से पूछा था...मां मैं कैसी लग रही हूं, अच्छी लग रही हूं ना....अफसोस में डूबी और आंसू बहाते बहाते सूख चुकी उसकी आंखों में बार बार एक सवाल उभरता नज़र आता था...मैंने तो उस रोज अपनी लाडली की नजर भी तो उतारी थी...लेकिन ये सब कैसे हो गया...और अचानक सुबकने की वो खामोश चीखें चारो तरफ सुनाई पड़ने लगती हैं...

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सचमुच अंजलि इस घर की मर्द ही तो थी, जिससे एक मां और एक बहन के साथ साथ भाइयों की उम्मीद ज़िंदा थीं...लेकिन उसके मरने की मनहूस खबर ने जैसे ही घर के दरवाजे पर दस्तक दी, मानों एक साथ इस घर में कई लाशें पैदा हो गईं...कहीं उम्मीद चकनाचूर हो गई तो कहीं सपनों ने दम तोड़ दिया...मां की उखड़ती सांसों ने अब आस का दामन भी छोड़ दिया...

मंगोलपुरी के उस मकान के आस पास जमा लोग अपने साथ कई नई ताजा और अनोखी जानकारियों की भीड़ के साथ नज़र आ जाएंगे...कुछ लोगों की जुबान पर तो किस्सों का ऐसा तांता था जिसे अल्फाज तक नहीं दिए जा सकते। वहां से करीब दो किलोमीटर की दूरी पर ही करण विहार पड़ता है।

यहीं अंजलि अपने परिवार के साथ रहा करती थी। उस मोहल्ले की टूटी सड़कों और कच्चे मकानों के बीच से गुजरों तो कोई न कोई आपको टोक ही देगा, कि संभलकर चलना, गली कच्ची है। नज़र उठाकर देखो तो गली के दोनों तरफ बजबजाती नालियां उसी तरह से नज़र आ जाएंगी जैसे मोहल्ले में लोग भुनभुनाते हुए किसी न किसी ऐसी बात पर साझेदारी निभा रहे होते हैं जिन्हें सुना तो जा सकता है शायद लिखा नहीं जा सकता।

Kanjhawala Case: उन्हीं रास्तों के बीच हो सकता है कि कोई आपका हमसफर बन जाए उस घर तक जहां अंजलि रहती तो थी, लेकिन इन दिनों क़ानून के सिपाहियों का पहरा बैठा हुआ है। जहां ऊंची आवाज में बोलना बतियाना और एक दूसरे को गुहारना वहां का रोज मर्रा का काम होता है, उसी गली में सन्नाटा परसा हुआ था...लोग बात तो कर रहे थे, लेकिन फुसफुसाकर।

कानों में पड़ी ये बात हालात और माहौल का पता दे देती है कि हमकों भी तो अपनी बहन बेटियां देखनी हैं...चार पैसों के लिए घर से बाहर भेजें उससे अच्छा है कि जो कुछ भी रूखा सूखा मिल जाए उसी से गुजारा कर लें...कम से कम इज्जत तो मिलेगी।

नीली शॉल को सिर से ओढ़े बैठी अंजिल की मां को कहते सुना तो दिल कांप उठा...क्या इस मामले में कुछ गलत भी हुआ है...ये गलत वही संस्कारी जुबान है जिसमें रेप और छेड़खानी छुपी हुई है....कंबल में छुपे अपने हाथों की उंगलियों को चलाते हुए वो बीमार आवाज ये कहकर सुबकने लगी, “ वो तो फूल छींटने और नमस्ते करने का काम करती थी और उसी में थोड़ी बहुत कमाई हो जाती थी”

अंजलि की मां को अच्छी तरह से याद है वो आखिरी लम्हा जब उसने पिंक जैकेट के साथ नई पैंट पहनी थी, और चहक रही थी...लेकिन जब बेजान अंजलि घर आई तो उसके बदन पर एक भी कपड़ा तक नहीं था, कपड़ा तो छोड़िए, बदन पर खाल की ज़िल्द तक नहीं बची थी...सड़क पर घिटते हुए उसकी लाश उधड़ चुकी थी। और मांस के लोथड़े इधर उधर लटके हुए थे।

ये सब देखकर वो बीमार मां अब और भी ज़्यादा बीमार दिखने लगी, उसका दिल डूबा जा रहा था, आंखें लगभग सूख चुकी थीं...और अब वो पूरी तरह से गुम हो चुकी थी...क्योंकि अब उसने अपनी बच्ची की लाई हुई उस शॉल को बदन से कस कर लपेटकर हैवानियत और इंसाफ की आवाज जैसी सर्द हवाओं से खुद को बचाने की जद्दोजहद शुरू कर दी थी।

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