47 KM तक बस की उस पिछली सीट पर....14 सालों में बस किलोमीटर बदला-निर्भया की तक़दीर नहीं

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In 14 years, only the kilometers changed, not Nirbhaya's fate

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यह वाक्य देश में महिलाओं की सुरक्षा और सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की गंभीर विफलता पर तीखा प्रहार करता है। लगभग 14 साल पहले 16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में हुए दर्दनाक 'निर्भया' कांड ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। उस घटना के बाद सख्त कानून बने, 'निर्भया फंड' का गठन हुआ और बसों में सीसीटीवी, पैनिक बटन तथा जीपीएस जैसे सुरक्षा उपाय अनिवार्य किए गए।

हालांकि, वर्षों बीत जाने के बावजूद जमीनी हकीकत में कोई खास बदलाव नहीं आया है। हाल ही में ग्रेटर नोएडा से दिल्ली के कश्मीरी गेट के बीच एक चलती स्लीपर बस में 16 वर्षीय नाबालिग के साथ हुई दरिंदगी की घटना ने फिर से 2012 के खौफनाक मंजर की यादें ताजा कर दी हैं। पर्दों से ढकी और बंद लाइटों वाली बस में पीड़िता को लगभग 47 किलोमीटर के सफर के दौरान यातनाएं दी गईं, लेकिन रास्ते में न तो किसी पुलिस चेकिंग ने उसे रोका और न ही कोई आपातकालीन अलर्ट सिस्टम काम आया।

"47 KM तक बस की उस पिछली सीट पर... 14 सालों में बस किलोमीटर बदला निर्भया की तक़दीर नहीं" पंक्ति दर्शाती है कि समय बीतने और दूरी बदलने के बाद भी बेटियों के लिए सड़कें और गाड़ियां आज भी उतनी ही असुरक्षित हैं। यह प्रशासन और पुलिस व्यवस्था की लापरवाही पर एक बड़ा सवाल खड़ा करती है।

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