मुझे भी कुछ कहना है! लाउड स्पीकर बोलेगा

मुझे भी कुछ कहना है! लाउड स्पीकर बोलेगा
मुझे भी कुछ कहना है! लाउड स्पीकर बोलेगा
मुझे भी कुछ कहना है! लाउड स्पीकर बोलेगा

Shams ki Zubani : मेरे बारे में तो सब बात कर रहे हैं। पर मुझे आपसे बात करनी है। सुन रहे हैं ना? सुनेंगे क्यों नहीं...मैं सुनने-सुनाने के लिए ही तो पैदा किया गया हूं.....मैं ही तो हूं तो जिसने इशारों को आवाज़ दी...आवाज़ को असर....असर को ताक़त....ताक़त को कान.....कानों को बोल......बोल को शोर....शोर को चीख़....और चीख़ के बीच-बीच ख़ामोशी भी। मैं आपके पैग़ाम और संदेशे को दूर-दूर-दूर तक पहुंचाने के लिए आया था। पर मेरी आवाज़ एक रोज़ उन्हीं कानों के लिए ज़हर बन जाएंगी सोचा नहीं थाा। मेरी आवाज़ कितने और किन-किन कानों तक पहुंचेंगी ये मैंने नहीं आप सबने ही तो तय किया था। आप सब ने ही तो ये फैसला किया था कि मैं कहां रहूंगा....कितनी ऊंचाई या निचाई पर रहूंगा...कब बोलूंगा...क्या बोलूंगा...कितना बोलूंगा...कितने धीमे या ज़ोर से बोलूंगा...मेरी आवाज़ को शोर और कानों की चुभन आपने ही तो बनाया...पर वाही री मेरी किस्मत.....आपकी दी उस चुभती आवाज की चुभन के लिए खामखा बदनाम भी मैं ही हो रहा हूं....मैं तो फकत एक मशीन ही हूं ना। आप इंसान तो मेरे मालिक हैं...आपके हुक्म और मर्जी से ही तो मैं बोलता, चीख़ता, गाता, चिल्लाता शोर करता हूं...तो आप ही बताइए असली गुनहगार कौन है....मैं य़ा आप? आप सबने मेरी आवाज़ को जहां-तहां कब शोर में बदल दिया आपको खुद अहसास नहीं है। इसीलिए आज मुझे खुद आना पड़ा....आपको अपनी सच्चाई बताने...अपनी कहानी सुनाने...तो चलिए....शुरू से मैं अपनी कहानी शुरू करता हूं। कहानी मेरी....यानी लाउडस्पीकर की।

जब इंसान के हाथ खाली थे। कपड़े भी नहीं थे बदन पर। बोलना भी उसे आता नहीं था, तब भी उसे एक चीज़ आती थी.. पैग़ाम देना। कोई बिछड़ जाए तो वो उसे पुकार कर बुलाता था, किसी को आगाह करना हो तो वो उसे चिल्ला कर बताता था। ((आदिमानव का बुलाते हुए))

ज़माना बदला तो जो आदिमानव थे वो आदिवासी बन गए। वो अब जिस्म पर खाल भी लपेटने लगे। खाने के लिए शिकार भी करने लगे। और अब तो वो एक दूसरे तक पैगाम पहुंचने के लिए अलग अलग आवाज़ भी निकालने लगे थे। वक्त गुज़रता गया, चीज़ें बदलने लगी, लोग सभ्य और शालीन होने लगे। अब सिर छुपाने के लिए उनके पास छत भी थी, पहनने को कपड़े भी, खाने को पकवान थे और अब पैगाम देने के लिए उनके पास नए सामान भी थे। 

 पैगाम देने की यही रिवायत मज़हब पर भी लागू होने लगी, मंदिर में तेज़ आवाज़ में आरती, मस्जिद से आज़ान, गिरजाघरों से घंटों की आवाज़ इबादत के वक्त का इशारा करने लगीं। मस्जिदों में अज़ान देने के लिए उन मुअज़्ज़िनों को चुना जाता था जिनकी आवाज़ तेज़ हो, मंदिरों में आरती के दौरान उन सामान को पीटने की परंपरा शुरु हुई जिसकी आवाज़ दूर तलक जाए। इसी मकसद से गिरजाघरों में घंटे लगवाए गए।

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