जेल से बाहर आया यूपी का बाहुबली, जौनपुर में मची खलबली: अब दोबारा होगा पत्नी श्रीकला का नॉमिनेशन

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Uttar Pradesh Crime: पूर्व सांसद धनंजय सिंह को हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद बुधवार को बरेली जेल से रिहा कर दिया गया। पत्रकारों के सवाल के जवाब में धनंजय ने कहा कि मेरी पत्नी जौनपुर से बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं। मेरी शुभकामनाएं उनके साथ हैं। जीत भी होगी। जौनपुर की एमपी-एमएलए अदालत ने 6 मार्च को धनंजय सिंह और उनके सहयोगी संतोष विक्रम को, नमामि गंगे परियोजना प्रबंधक अभिनव सिंघल के साल 2020 में दर्ज अपहरण और जबरन वसूली के मामले में सात साल के कारावास की सजा सुनाई थी।

बरेली जेल से रिहा हुए पूर्व सांसद धनंजय सिंह

धनंजय सिंह को जौनपुर जिला जेल में रखा गया था और बाद में बरेली जेल ट्रांसफर कर दिया गया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछली 27 अप्रैल को धनंजय सिंह को जमानत दी थी। लेकिन जिला अदालत की ओर से सुनाई गई सात साल के कारावास की सजा को निलंबित करने या स्थगित करने की उनकी याचिका को खारिज कर दिया था। जेल से रिहा होने के बाद धनंजय सिंह ने संवाददाताओं से कहा कि जौनपुर जिले में नमामि गंगे परियोजना में भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए साल 2020 में उनके खिलाफ एक फर्जी मामला दर्ज किया गया था।

जेल से निकलते ही अभय सिंह के नाम पर भड़के धनंजय

आपको बता दें कि 10 मई 2020 को मुजफ्फरनगर के लाइन बाजार में रहने वाले नमामि गंगे के प्रोजेक्ट मैनेजर अभिनव सिंघल ने धनंजय सिंह और उनके साथी विक्रम के खिलाफ रंगदारी और अपहरण का मुकदमा दर्ज कराया था। अधिकारी का आरोप था कि विक्रम अपने दो साथियों के साथ उसका अपहरण कर धनंजय सिंह के घर ले गया था। रंगदारी और अपहरण के इसी मामले में एमपी-एमएलए कोर्ट ने धनंजय सिंह को दोषी करार दिया था। जेल से निकलने पर जब पत्रकारों ने धनंजय से अभय सिंह के डॉन वाले बयान पर प्रतिक्रिया मांगी तो उन्होंने कह दिया कि अपराधियों की बात का क्या जवाब देना। 

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राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं धनंजय सिंह

धनंजय सिंह साल 2002 के विधानसभा चुनाव में 27 साल की उम्र में पहली बार निर्दलीय विधायक बने थे। इसके बाद 2007 में वह जेडीयू के टिकट पर विधायक बने। इतना ही नहीं, वह बसपा में भी शामिल हो गए और 2009 में लोकसभा चुनाव लड़कर जौनपुर के सांसद बने। अपराध जगत में धनंजय सिंह का नाम तब तेजी से उभरा जब 1997 में BSP नेता मायावती के शासनकाल में बन रहे अंबेडकर पार्क से जुड़े लोक निर्माण विभाग के इंजीनियर गोपाल शरण श्रीवास्तव की ठेकेदारी के विवाद में हत्या कर दी गई थी। इस मामले में धनंजय सिंह पर आरोप लगा और वह फरार हो गए। सरकार ने उन पर 50 हजार का इनाम तक घोषित कर दिया था।

दशकों पुराना है धनंजय सिंह का आपराधिक इतिहास

दो साल बाद 1999 में धनंजय सिंह ने कोर्ट में सरेंडर कर दिया, लेकिन इस दौरान उनका नाम 1997 में राजधानी के मशहूर लॉ मार्टिनियर कॉलेज के असिस्टेंट वार्डन फ्रेडरिक गोम्स हत्याकांड और संतोष सिंह हत्याकांड से भी जुड़ा। उन पर लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र नेता अनिल सिंह वीरू की हत्या के प्रयास का भी आरोप था। कोर्ट में सरेंडर करने के बाद भी ठोस सबूत के अभाव में धनंजय सिंह इंजीनियर हत्याकांड से बरी हो गये। पुलिस ने इस हत्या के बाद से फरार चल रहे धनंजय और उसके तीन साथियों को 1998 में भदोही में एक मुठभेड़ में मारने का दावा किया था। बाद में पता चला कि मारे गए चारों युवक निर्दोष थे। इस मामले में 22 पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया गया था, जो अभी भी जिला सत्र न्यायालय में लंबित है।

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