गुजरात दंगा मामले में PM मोदी को मिली राहत, सुप्रीम कोर्ट ने कहा जाकिया जाफरी किसी और के इशारे पर काम कर रही थी

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Supreme Court: देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने आज एक बार फिर प्रधानमंत्री (Prime Minister) नरेंद्र मोदी की क्लीन चिट पर दाग नहीं लगने दिया और उनकी उस क्लीन चिट (Clean Chit) को जैसे का तैसा ही रखा जैसा SIT ने उन्हें दी थी। असल में सुप्रीम कोर्ट ने 2002 के दंगों के मामले में ज़ाकिया जाफरी की याचिका खारिज (Petition) कर दी। ये याचिका 2002 के दंगों के लिए तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका को लेकर दायर की गई थी। असल में गुजरात दंगों (Gujrat Riot) की जांच के लिए बनाई गई SIT ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दे दी थी। लिहाजा ज़ाकिया जाफरी ने SIT की उसी रिपोर्ट के ख़िलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

सुप्रीम कोर्ट ने 24 जून को तीन जजों की पीठ ने पूर्व सांसद अहसान जाफरी की पत्नी जाकिया जाफरी की याचिका पर फैसला सुनाया। जस्टिस ए एम खानविलकर, जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस सीटी रविकुमार की बेंच ने 9 दिसंबर 2021 को इस याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित किया था।

असल में गुलगबर्ग सोसाइटी मामाले में SIT से मिली नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट को ज़ाकिया जाफरी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। एक लंबी सुनवाई और जिरह के बाद हाईकोर्ट ने ज़ाकिया जाफरी की याचिका को 2017 में खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट के उस फैसले के ख़िलाफ दिसंबर 2019 में जाकिया जाफरी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, ज़ाकिया किसी दूसरे के इशारे पर काम कर रहीं

सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात दंगे के मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए जाकिया जाफरी और उनकी दलीलों को लेकर बड़ी ही गंभीर टिप्पणियां की हैं।

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जाकिया जाफरी के तर्क से एसआईटी के सदस्यों की सत्यनिष्ठा और ईमानदारी को कम आंकने की कोशिश की गई।

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सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एसआईटी के सदस्य अनुभवी थे और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ जटिल अपराधों की जांच करने की क्षमता थी।

जाकिया जाफरी के तर्क लचर और एसआईटी की जांच को कमजोर करने का प्रयास था। साथ ही कोर्ट पर भी सवाल उठाने का प्रयास था।

एसआईटी ने जांच के दौरान जुटाई गई सभी सामग्रियों पर विचार करने के बाद ही अपनी राय बनाई थी। इसलिए एसआईटी की अंतिम रिपोर्ट को बिना कुछ फेर बदल किए स्वीकार किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने जाकिया जाफरी पर सवाल उठाते हुए कहा कि उनकी ये याचिका कड़ाही को खौलाते रहने की कोशिश है। ये गुप्त डिजाइन पर चलाई गई मुहिम थी। वास्तव में, न्यायिक और जांच प्रक्रिया के ऐसे दुरुपयोग में शामिल सभी लोगों को कटघरे में खड़ा करने की जरूरत है। उनके खिलाफ कानून के मुताबिक कार्यवाही और कार्रवाई करने की जरूरत है।

जाकिया की याचिका "किसी दूसरे " के निर्देशों से प्रेरित नजर आती है।

514 पेज की याचिका के नाम पर जाकिया परोक्ष रूप से विचाराधीन मामलों में अदालतों द्वारा दिए गए फैसलों पर भी सवाल उठा रही थी।उसने ऐसा क्यों किया ये तो बस उसे ही पता है। वह स्पष्ट रूप से किसी और के इशारे पर ऐसा कर रही थी।

अब सवाल उठता है कि आखिर अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसाइटी में 2002 में क्या हुआ था? जिसको लेकर आज तक सवाल उठाए जा रहे हैं।

Gujrat Riot : दरअसल 27 फरवरी 2002 को हुए गोधरा कांड के ठीक अगले रोज़ यानी 28 फरवरी 2002 को अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसाइटी में दंगा भड़क उठा था। अहमदाबाद शहर में इस सोसाइटी पर दंगाइयों ने हमला बोल दिया था। उसी सोसाइटी में कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी भी अपने परिवार के साथ रहते थे।

ये अहमदाबाद की शायद इकलौती ऐसी सोसाइटी थी जिसमें 29 बंगले और 10 फ्लैट थे और इस सोसाइटी में सिर्फ एक पारसी परिवार को छोड़कर बाकी सभी मुस्लिम थे। दंगाइयों के हमलों ने सोसाइटी के 69 लोगों को मौत के घाट उतार दिया था जिसमें पूर्व सांसद जाफरी भी शामिल थे। सबसे हैरानी की बात ये थी कि उस क़त्ले आम के बाद 39 लोगों को शव तो बरामद हो गए थे लेकिन 30 शवों का कहीं कोई अता पता नहीं मिला था।

ज़ाहिर है कि गुलबर्ग सोसाइटी मामले में पूरे देश में हंगामा खड़ा हो गया था और उस वक़्त के गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी कई सवाल खड़े हो गए थे।

Gujrat Riot - इस दंगे के बाद गुलबर्ग सोसाइटी केस की जांच का ज़िम्मा अहमदाबाद पुलिस को सौंपा गया था

- गुलबर्ग सोसाइटी में हुए कत्ल ए आम की जांच को लेकर अहमदाबाद पुलिस ने एक SIT गठित की थी।

- क़रीब दो साल तक चली जांच के बाद 2002 से लेकर 2004 तक क़रीब छह चार्जशीट दाखिल की गई थी।

- इसके बाद इस मामले में मानवाधिकार आयोग ने भी दखल दिया जिसकी अर्जी के बाद साल 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने गुलबर्ग सोसाइटी समेत दंगों के नौ मामलों पर रोक लगा दी थी।

- एक लंबी सुनवाई के बाद देश की सबसे बड़ी अदालत ने साल 2008 में स्टे वाले सभी नौ मामलों की जांच का जिम्मा SIT को सौंप दिया था।

- 2008 में ही CBI के पूर्व निदेशक आर के राघवन को SIT की कमान सौंपी गई।

- सुप्रीम कोर्ट ने 11 फरवरी 2009 को SIT को निर्देश दिया कि अदालत में केस की सुनवाई पर भी नज़र रखी जाए।

- 1 मई 2009 को सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात दंगों से जुड़े सभी बड़े मामलों की सुनवाई पर लगे स्टे को हटा लिया।

- 26 अक्टूबर 2009 को सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला लिया और गुलबर्ग सोसाइटी को छोड़कर सभी मामलों में फैसला सुनाने का आदेश दिया।

- गुलबर्ग सोसाइटी के निवासी और पूर्व सांसद एहसान जाफरी की पत्नी जाकिया जाफरी ने नए सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की।

- सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अर्जी में जाकिया जाफरी ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई लोगों के ख़िलाफ आरोप लगाए।

- सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर ही 27 और 28 मार्च 2010 को SIT ने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से लंबी पूछताछ की। पूछताछ में नरेंद्र मोदी ने सभी आरोपों को ग़लत बताया।

- नरेंद्र मोदी ने SIT के सामने साफ किया कि 28 फरवरी को एहसान जाफरी ने उन्हें मदद के लिए फोन नहीं किया था।

- 2009 से लेकर 2014 तक सुनवाई के दौरान तबादले और रिटायरमेंट की वजह से तीन जज बदले गए।

- 17 अक्टूबर 2014 को गुलबर्ग सोसाइटी केस की सुनवाई के लिए जज पी बी देसाई को नियुक्त किया गया।

- 22 फरवरी 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने विशेष अदालत को अगले तीन महीनों के भीतर फैसला सुनाने को कहा गया।

- गुलबर्ग सोसाइटी केस में 68 लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल हुए, जिनमें से चार नाबालिग हैं।

- इस मामले में पांच आरोपियों की सुनवाई के दौरान मौत हो गई जबकि दो लोगों को अदालत ने ही आरोपी बनाया। ऐसे में गुलबर्ग सोसाइटी मामले में 61 आरोपी ही बचे रह गए।

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