क्या होता है डर्टी बम? कैसे होता है इससे भयानक नुक़सान?

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने जैसे ही दुनिया के सामने डर्टी बम की थ्योरी को रखा तो हर कोई इसका अनुमान और अंदाज़ा लगाने की फिराक़ में लग गया कि आखिर ये डर्टी बम होता क्या है और ये कितना ख़तरनाक हो सकता है। तो इस डर्टी बम को समझ लेना ज़्यादा मुनासिब होगा।
क्या होता है डर्टी बम? कैसे होता है इससे भयानक नुक़सान?

बम धमाके की सांकेतिक तस्वीर

बेहद ख़तरनाक होता है 'डर्टी बम'

WAR KNOWLEDGE STORY : रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन के ख़िलाफ़ दुनिया के सामने एक शिगूफा तो छोड़ दिया। पुतिन ने दुनिया को बताने की यही कोशिश की है कि यूक्रेन दोगला है और वो परमाणु हथियारों की होड़ में न होकर भी परमाणु हथियार जैसे घातक बमों को तैयार कर रहा है, जिसे डर्टी बम कहा जा सकता है।

सवाल उठता है कि जिस बम का डर से व्लादिमीर पुतिन दुनिया को डरा रहे हैं वो डर्टी बम, आखिर होता क्या है और कैसे काम करता है? अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन यानी CDC के मुताबिक़ डर्टी बम डायनामाइट जैसे विस्फोटकों का रेडियोएक्टिव पावडर या फिर रेडिएशन फैलाने वाले तत्वों का एक मिश्रण है।

रेडिएशन की वजह से ख़तरनाक होता है 'डर्टी बम'

WAR KNOWLEDGE NEWS: सीधी जुबान में कहें तो साधारण बमों में जो बारूद इस्तेमाल किया जाता है, उसमें कुछ ऐसे तत्वों की मिलावट कर दी जाती है जिनसे विकिरण फैल सकता है। विकिरण फैलाने के लिए जो तत्व ज़िम्मेदार हैं उनका कचरा या फिर उनका बचा हुआ भाग बम के बारूद में मिला दिया जाता है। इसे ही डर्टी बम या फिर रेडियोलॉजिकल डिसपर्सल डिवाइस जैसे नामों से पुकारा जाता है और अक्सर इन्हें एक दूसरे की जगह इस्तेमाल किया जाता है।

जिस बम से होता ये है कि बम का बारूद जब धमाके के साथ फटता है और उसमें आग लगती है तो ये रेडियोएक्टिव तत्व धमाके के साथ आस पास के इलाके में बिखर जाते हैं या फिर बारूद के गुबार के साथ दूर दूर तक छिटक जाते हैं। जिससे हर जगह रेडियोधर्मिता यानी विकिरण फैल जाता है। मौजूदा वक़्त में परमाणु हथियारों में आमतौर पर प्लूटोनियम या फिर यूरेनियम का आइसोटोप 238 ही इस्तेमाल किया जाता है। जिसका विकिरण सबसे ज़्यादा और तेजी से फैलता है।

<div class="paragraphs"><p>बम धमाके की सांकेतिक तस्वीर</p></div>

बम धमाके की सांकेतिक तस्वीर

परमाणु हथियारों से बहुत अलग है 'डर्टी बम'

DIRTY BOMB WAR KNOWLEDGE :ये बात तो किसी से छुपी नहीं है कि दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जब जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर जो परमाणु बम गिराए गए थे तो उसमें परमाणु के टूटने से जो ऊर्जा निकली वो इतनी ज़्यादा थी कि तमाम शहर को तबाह कर दिया था। इसे विज्ञान की भाषा में FISSION यानी विखंडन की प्रक्रिया कहा जाता है। जिसके तहत तत्व का परमाणु टूटता है।

ये इतना ताक़तवर होता है कि जब इसका विस्फोट होता है तो आस पास के वातावरण की पूरी ऑक्सीजन को ही सोख लेता है और उसकी वजह से जो वैक्यूम बनता है तो धमाके के फौरन बाद एक धुएं के गुबार उठता है जिसका आकार मशरूम की तरह होता है, इसे परमाणु बादल भी कहा जा सकता है।

जिससे होता ये है कि वातावरण में बेतहाशा गर्मी बढ़ जाती है, और वातावरण में मौजूद ऑक्सीजन को ये विखंडन की प्रक्रिया पूरी तरह से सोख लेती है। जिसकी वजह से सांस लेना नामुमकिन हो जाता और गर्मी की वजह से जल या पानी पूरी तरह से भाप बनकर उड़ जाता है।

डर्टी बम में धुएं से फैलता है विकिरण

BOMB WAR KNOWLEDGE : लेकिन डर्टी बम परमाणु हथियारों के मुकाबले एकदम अलग होते हैं। इसमें परमाणु हथियारों की तरह कोई बड़ा विस्फोट तो नहीं होता मगर धमाके के साथ साथ बारूद और धुएं के जो कण आस पास बिखरते हैं उससे ही रेडियो एक्टिव तत्व के कण भी बिखर जाते हैं और उसके विकिरण के असर में आए लोगों को कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की चपेट में ला देता है।

असल में डर्टी बम का सबसे बड़ा ख़तरा इसके विस्फोट से ही है। क्योंकि बम का धमाका होता है तो उसकी आवाज़, उसकी आग और उसके विस्फोट से जो ऊर्जा निकलती है उससे आस पास की चीज़ों को सबसे ज़्यादा नुकसान पहुँचता है।

<div class="paragraphs"><p>बम धमाके के बाद धुएं के बादल</p></div>

बम धमाके के बाद धुएं के बादल

रेडिएशन का होता है बाद में असर

DIRTY BOMB WAR KNOWLEDGE : डर्टी बम के इस्तेमाल में जो लोग या चीज़ें उसके विस्फोट के आस पास होती हैं उन पर तो रेडिएशन का ख़तरा ज़्यादा रहता है, लेकिन जो उसके नज़दीक नहीं होते हैं उन पर इसका असर जल्दी नहीं होता। चूंकि इस बम में धुआं दूर तक फैल जाता है ऐसे में रेडियोएक्टिव कण दूर दूर तक फैलकर हवा में घुल जाते हैं और सांस के साथ शरीर के भीतर पहुँच जाते हैं।

सबसे हैरानी और चौंकानें वाली बात ये है कि इस डर्टी बम के असर को तत्काल न तो देखा जा सकता है और न ही इसकी गंध को महसूस किया जा सकता है। मगर इसका नुकसान बाद में दिखता है, क्योंकि रेडिएशन बाद में जब अपना असर दिखाता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

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