इंसानी मांस खाने वाले राष्ट्रपति इदी अमीन की कहानी, जिसे आदमखोर कहा जाता था

दुनिया के इतिहास में किसी देश का ऐसा राष्ट्राध्यक्ष ना कभी हुआ, ना शायद कभी होगा। ये राष्ट्रपति अपने दुश्मनों को मारकर उनके गोश्त से बुझाता था अपनी भूख।
इंसानी मांस खाने वाले राष्ट्रपति इदी अमीन की कहानी, जिसे आदमखोर कहा जाता था
Idi Amin

Idi Amin Story in hindi : दुनिया में ऐसी कई मिसालें हैं जब इंसान आदमखोर होकर इंसानों का ही मांस खाने लगे, लेकिन इंसानी तारीख में ऐसा पहली बार हुआ जब एक देश का राष्ट्रपति आदमखोर हो गया। ये कहानी उसी आदमखोर राष्ट्रपति की है जो खाता था इंसान का मांस। वो सिर्फ इंसानों का मांस ही नहीं खाता था बल्कि जिनका मांस खाता था उनके सिरों को अपने फ्रिज में रख भी लेता था, और राष्ट्रपति की गद्दी पर बैठ कर वो ये घिनौनी हरकत सालों साल करता रहा।

जब ये बात बाहर आई तो लोगों उसे हैवान, शैतान और अफ्रीका का हिटलर कहा, लेकिन दुनिया उसके बारे में क्या सोचती रही इससे उसे कभी फर्क नहीं पड़ा। नाम था उसका ईदी अमीन (Idi Amin), और वो था अफ्रीका (Africa) के एक छोटे से देश युगांडा (Uganda) का राष्ट्रपति। ईदी अमीन पर इसके अलावा 6 लाख लोगों का कत्ल करवाने का भी इल्ज़ाम लगा। वो बुरा था, क्रूर था, ये उसके देश के लोग जानते थे मगर कभी किसी ने उसके खिलाफ आवाज़ नहीं उठाई।

जानते हैं क्यों? क्योंकि एक बार कुछ लोगों ने उसके खिलाफ आवाज़ उठाई थी, और उन्हें पहले खुलेआम लकड़ी के खंबों से बांधा गया, फिर उनके मुंह पर काला कपड़ा लपेट कर गोलियों से भुनवा दिया गया। और तो और इन लाशों को ट्रक में लादकर आदमखोर ईदी अमीन के पास भेज दिया गया, कहा जाता है कि उसने इन लाशों से अपनी भूख मिटाई।

आपके ज़हन में ये सवाल उठ सकता है कि इंसान का मांस खाने वाला एक दरिंदा आखिर एक देश का राष्ट्रपति कैसे बन गया? तो सुनिए आदमखोर ईदी अमीन के राष्ट्रपति बनने की कहानी जितनी दिलचस्प है उतनी ही खूनी भी है, ये एक सेना के खानसामे से एक देश के राष्ट्रपति बनने की कहानी है। युगांडा की सेना में ईदी अमीन एक अदना सा खानसामा था, अमीन के पास एक बेहद चालाक और खूंखार दिमाग था लेकिन उसकी तरक्की की पहली सीढ़ी बना उसका राक्षस जैसा शरीर।

ईदी अमीन का कद था 6 फुट 4 इंच और उसका वजन था पूरे 160 किलो। उसके जिस्म में जानवर जैसी ताकत थी और इसी ताकत को बनाया उसने हथियार, सेना की नौकरी के दौरान उसने बॉक्सिंग को अपना करियर बनाया, वो पूरे नौ साल तक लगातार युगांडा का नेशनल चैंपियन रहा और इसी की बदौलत उसे मिलती रही सेना में तरक्की। बागियों को कुचलने में ईदी अमीन को बेहद मज़ा आता था, युगांडा की सरकार के खिलाफ किसी भी विद्रोह को अमीन बेहद खूनी तरीके से कुचल देता था।

कहते हैं इसी दौर में ईदी अमीन के मुंह में लगा इंसान का खून, वो अपने दुश्मनों को खुद अपने हाथ से मारता और फिर उनके शरीर के हिस्सों को खा जाता, लेकिन उस दौर में इस हकीकत को कोई नहीं जान पाया।

Idi Amin ki kahani : 1965 तक आते आते ईदी अमीन युगांडा की फौज में जनरल बन गया, अब अमीन की नज़र थी युगांडा की गद्दी पर। युगांडा के प्रधानमंत्री मिल्टन ओबोटे अमीन पर बेहद भरोसा करते थे, लेकिन एक दिन अमीन ने इस भरोसे को चकनाचूर कर दिया। प्रधानमंत्री ओबोटे सिंगापुर में थे और इधर राजधानी कंपाला में ईदी अमीन ने कर दिया खूनी तख्तापलट। महज़ तीन घंटे में पूरे देश की बाग़डोर ईदी अमीन के हाथ में आ गई।

राजधानी कंपाला की सड़कों पर ईदी अमीन का किसी बादशाह की तरह काफिला निकल रहा था, लोग खुशी में नारे लगा रहे थे, गा रहे थे, नाच रहे थे। वो तारीख थी 25 जनवरी 1971, ईदी अमीन के लिए खुशी मना रहे युगांडा के लोगों को ये कतई अंदाज़ा नहीं था कि उस रोज़ के बाद उनकी ज़िंदगी में अब कोई खुशी का दिन नहीं आने वाला है। 25 जनवरी 1971 वो तारीख थी जो सिर्फ पूरे युगांडा, पूरे अफ्रीका के लिए ही नहीं बल्कि पूरी इंसानियत के लिए एक काला दिन साबित होने वाली थी, क्योंकि अब युगांडा के तख्त पर बैठ चुका था एक आदमखोर।

ईदी अमीन ने सत्ता में आते ही अपने खूनी रंग दिखाने शुरु कर दिए, उसने एक एक करके अपने विरोधियों को ठिकाने लगा दिया, सत्ता छीनने के एक साल के भीतर ही ईदी अमीन युगांडा का सबकुछ था। वही कानून था और वही देश, ईदी अमीन खुद को दादा कहता था और युगांडा में दादा का विरोध करने वालों को मिलती थी खुलेआम मौत की सज़ा। लेकिन ईदी अमीन का सबसे घिनौना चेहरा अब तक दुनिया के सामने आना बाकी था।

दुनिया को ये नहीं पता था कि ईदी अमीन दादा एक नरभक्षी है, यानि इंसान का मांस खाने वाला आदमखोर। ईदी अमीन के इस राज़ पर से सबसे पहले पर्दा उठाया उनके डॉक्टर किबो रिंगोटा ने, डॉक्टर किबो एक बार ईदी अमीन के किचन में बर्फ लेने के लिए गए, जब उन्होने फ्रिज खोला तो उनकी आंखे फटी की फटी रह गईं। फ्रिज में रखे हुए थे दो नरमुंड, डॉक्टर किबो ने जब कुछ और लोगों से पूछताछ की तो पता चला कि ईदी अमीन का फ्रिज हमेशा इंसानी लाशों से भरा रहता है।

कहते हैं ईदी अमीन को अपने दुश्मनों के शरीर का मांस खाने में सबसे ज्यादा मज़ा आता था, ईदी अमीन इस वहशियाना हरकत का सबूत दिया था एक और सरकारी डॉक्टर ने, 1975 में ईदी अमीन ने पहले तो उसकी बात ना मानने वाले चीफ जस्टिस की हत्या करवा दी और जब चीफ जस्टिस का पोस्टमार्टम चल रहा था तो खुद ईदी अमीन वहां पहुंच गया, डॉक्टर ने दावा किया था कि ईदी अमीन ने उसे वहां से जाने को कहा और फिर चीफ जस्टिस के मांस से अपनी भूख मिटाई।

ईदी अमीन की खूनी करतूते जब युगांडा के बाहर तक पहुंचने लगीं तो दुनिया ने उसे दिया एक नया नाम, अफ्रीका का हिटलर। ये नाम सुनकर उसे गुस्सा नहीं आता था बल्कि वो हंसता था। ईदी अमीन ने पूरे 8 साल तक युगांडा पर हूकुमत की, और इन 8 सालों में शायद ही ऐसी कोई सुबह रही हो जब युगांडा की सड़कों पर सैकड़ों लाशे ना मिली हों। दावा किया जाता है कि अपनी सत्ता के दौरान ईदी अमीन ने पूरे 6 लाख लोगों को मौत के घाट उतार दिया।

ईदी अमीन सिर्फ क्रूर नहीं था बल्कि बहुत बड़ा अय्याश भी था, वो सरकारी पैसों से अक्सर पार्टियां किया करता था। जिसमें शराब और शवाब का बोलबाला होता था। ईदी अमीन का मन औरत से कभी नहीं भरता था, उसने एक दो नहीं बल्कि 6 शादियां की, जिसमें से पांच शादियां तो उसने राष्ट्रपति की गद्दी पर बैठ कर कीं, 6 बीवीयों से ईदी अमीन के 45 बच्चे थे। ये तो ईदी अमीन के उस कुनबे की बात हो रही है जो सारी दुनिया के सामने था, लेकिन ईदी अमीन का हरम तो इससे भी बड़ा था।

अमीन के हरम में 35 से ज्यादा औरते थीं जिनसे उसके 100 से उपर बच्चे थे। कहा जाता है कि सत्ता के नशे में चूर ईदी अमीन की नज़र जिस किसी औरत पर पड़ जाती थी वो उसे हर हाल में हासिल करके ही मानता था, उस दौर में युगांडा की कई खूबसूरत औरतों के साथ ईदी अमीन ने बलात्कार किया, लेकिन कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाया और जिस किसी ने ऐसा करने की कोशिश की उसे दर्दनाक मौत मिली। ईदी अमीन की दूसरी पत्नी 'के अडोरा' को अपने आदमखोर पति से नफरत हो गई थी, इसीलिए उसने अपने डॉक्टर से मोहब्बत करने की गुस्ताखी कर ली, कहते हैं ईदी अमीन ने इस गुस्ताखी के लिए 'के अडोरा' को बड़ी बेरहम मौत दी।

सारी इंसानियत ईदी अमीन से नफरत करती थी लेकिन ईदी अमीन को सबसे ज़्यादा नफरत थी हिंदुस्तानियों से। उसकी नफरत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसने पल भर में फैसला लेकर एक लाख हिंदुस्तानियों को युगांडा से बेदखल कर दर दर की ठोकरे खाने के लिए मजबूर कर दिया था। दरअसल जब युगांडा पर ब्रिटेन की हुकूमत थी उस दौर में हज़ारों हिंदुस्तानियों को ब्रिटिश सरकार युगांडा लेकर गई थी, उनमें से ज्यादातर वहीं बस गए और अपनी काबिलियत की बदौलत उन्होने युगांडा की अर्थव्यवस्था में अपना दबदबा बना लिया।

ईदी अमीन जब सत्ता में आया तो उसका पहला शिकार वहां रहने वाले हिंदुस्तानी ही बने, 4 अगस्त 1972 के दिन ईदी अमीन ने 90 दिन के अंदर सारे हिंदुस्तानियों को दो सूटकेस के साथ युगांडा छोड़ने का फरमान सुना दिया, उसका मानना था कि युगांडा की सपंत्ति पर सिर्फ युगांडा के लोगों का अधिकार होना चाहिए। ईदी अमीन के इस फरमान के साथ ही वहां रहने वाले हिंदुस्तानियों में हड़कंप मच गया, अपने जमे जमाया धंधा पानी छोड़कर हिंदुस्तानी ब्रिटेन भागने लगे।

उस समय देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी ईदी अमीन को चेतावनी दी लेकिन सनकी तानाशाह ने इसे अनसुना कर दिया। ईदी अमीन ज़रुरत से ज्यादा निरकुंश होता जा रहा था, कभी वो इज्राइल के विमान का अपहरण करवाता तो कभी खुल्लम खुल्ला अमेरिका को धमकी देता, उसके सर पर लीबिया के तानाशाह कर्नल गद्दाफी का हाथ था।

गद्दाफी की ताकत पर ईदी अमीन को इतना भरोसा था कि उसने पड़ोसी मुल्क तंजानिया से दुश्मनी मोल ली, 30 अक्टूबर 1978 के रोज़ ईदी अमीन की फौज ने तंजानिया पर हमला बोल दिया, अमीन की मदद के लिए कर्नल गद्दाफी ने लीबिया की सेना भी भेज दी। अमीन की सेना और गद्दाफी की फौज ने मिलकर पूरे 6 महीने तक तंजानिया के साथ युद्ध लड़ा।

आदमखोर ईदी अमीन के दिन अब लदने वाले थे, तंजानिया की फौज धड़धड़ाती हुई युगांडा की राजधानी कंपाला में दाखिल हो गई। वो तारीख थी 10 अप्रैल 1979, ये ईदी अमीन की जुल्म की हुकूमत का आखिरी दिन था। 6 लाख लोगों के खून से अपनी प्यास बुझाने वाला ईदी अमीन हमेशा हमेशा के लिए युगांडा छोड़ कर भाग खड़ा हुआ, और अपने पीछे छोड़ गया खून खराबे और बर्बादी के निशान, लेकिन फिर भी युगांडा की जनता बेहद खुश थी वो जश्न मना रही थी।

ईदी अमीन सबसे पहले अपने दोस्त कर्नल गद्दाफी के देश लीबिया गया और वहां से पहुंच गया साऊदी अरब। अगले 24 साल तक ईदी अमीन साउदी अरब के शहर जेद्दा में रहा और वहीं 20 जुलाई 2003 को उसकी मौत हो गई। ईदी अमीन से युगांडा के लोग इतने गुस्से में थे कि उसकी लाश को भी वहां दफनाने की इजाज़त नहीं दी गई।

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